no name
मेरे रंज़-ए-ग़म की शियही से इक नज़म आई है,
भावनाओं के कोत्ूहल को भी कलम खींच लाई है
कोशिश ये है बिन काग़ज़ जलाए अपने दिल की गर्मी उतरना,
और मज़ा ये है इस गर्मी मैं जलता अपना घर देखना
और दर्द है इस घरोंदे मैं मेरा रह-बसर
दीवानगी है इस मंज़र-ए-खाक में मेरा तुझ को पुकारना
और खुशी है मेरी मौत पे तेरा गैर के साथ आना