भूल ना पाएँगे तुझे अक्सर ये गुमा होता था ,
आज इक रात कट गई तेरा नाम याद करने में;
पाँव पडते तेरे, मेरा शहर महका करता था ,
तेरी मीठी सी खुश्बू अब भी मेरे घर से आती है;
हवा के महलों पे तेरा अक्स पढ़ती मेरी नज़र
और वो सर्द रातों में तेरी सासों की महक;
ज़ंजीरें खोलती मेरे ख्यालों की, वो तेरी आमद
तू कोई ख़याल है कोई रंज या कोई वहम मेरा ,
ये कशमकश में एक और सदी कटती है
और वो चलते पानी पे तेरा ठहरा चेहरा
और वो बादलों को चीरते कुछ रेशमी धागे
मेरे गुलिस्ताँ के खिले फूल जब भी रोए ,
ना जाने क्यों ख़याल आया तेरा
बस इतना याद है तेरा नाम ले ले रात कटती थी ,
आज लाख कोशिश की तेरा नाम ना याद कर पाया मैं|