इस बार तो हंस ही देंगे गम की जो आमद होगी
गम भी खुश होगा मेरी खुशामद देख कर
अपने चेहरे पे हमने एक भी शीकन पड़ने ना दी
अशक सूखे हैं किसी को ना ये गुमा होगा
चाक गहरे हैं सीने की हिमत्त ना रही
बस इक गिनती है जो उंगलियों पे किया करते हैं
डरता है के बारिश हो ना जाए मेरे बंज़र पे
कुछ इस कदर सहमा है ‘रब खली’ मौत के डर से
क ल म रोती रही क्ल रत कुछ काग़ज़ के पन्नो पे
फलसफा लिखने जो लगा वो तेरी महोबत का