July 2011
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no name
मेरे रंज़-ए-ग़म की शियही से इक नज़म आई है, भावनाओं के कोत्ूहल को भी कलम खींच लाई है कोशिश ये है बिन काग़ज़ जलाए अपने दिल की गर्मी उतरना, और मज़ा ये है इस गर्मी मैं जलता अपना घर देखना और दर्द है इस घरोंदे मैं मेरा रह-बसर दीवानगी है इस मंज़र-ए-खाक में मेरा तुझ को पुकारना और खुशी है मेरी मौत पे तेरा गैर के साथ आना
Jul 27th
hope!
अंदर तक जला के, और खुद को दफ़ना के;                            भी देख लिया मैने आरज़ू है के इक बार जली बुझती ही नही. बारिश की बूँदों से हाथ भीगे तो ज़रूर, पर इस तरह तो नीर से मुट्ठी भरती ही नही. और ख़यालों ने की कुछ इस तरह से बेवफ़ाई हम से, के अब तो तेरी याद भी आ कर तड़पाती  ही नही.
Jul 3rd