December 2011
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aazadi
मुश्किल सा होता जा रहा है खुद को खुद ही से बचना
तोडो इस साँस की ज़ंज़ीर को और रिहा करो मुझ को खुदी से
क्यों जो कतरा कतरा बहता है तू मेरी रगों में किसी जानलेवा रोग की तरह
और मेरी नसों को तोड़ता है तेरी होंद का दर्द
नीला करता है मेरे बदन को तेरी छूअन का सर्द
सज़ा दो मुझे आज़ादी की इस मुर्दा बदन से
झोंक दो इस ‘अमन’ को किसी के हुस्न की अगन में
मौत दो ऐसी की महक जाए मेरी कब्र
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