August 2009
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भूल ना पाएँगे तुझे अक्सर ये गुमा होता था , आज इक रात कट गई तेरा नाम याद करने में; पाँव पडते तेरे, मेरा शहर महका करता था , तेरी मीठी सी खुश्बू अब भी मेरे घर से आती है; हवा के महलों पे तेरा अक्स पढ़ती मेरी नज़र और वो सर्द रातों में तेरी सासों की महक; ज़ंजीरें खोलती मेरे ख्यालों की, वो तेरी आमद तू कोई ख़याल है कोई रंज या कोई वहम मेरा , ये कशमकश में एक और सदी कटती है और वो चलते पानी पे तेरा ठहरा चेहरा...
ਦਿਨ
ਕੁਝ ਤਿਲਮਿਲਾਓਂਦੇ ਦਿਨ ਮਿਲੇ ਕੁਝ ਮੁਸਕਰੌਂਦੇ ਦਿਨ ਮਿਲੇ ਤੇਰੇ ਸ਼ਹਿਰ ਵਿਚ ਸਾਨੂ ਸਭ ਤਰਾਂ ਦੇ ਦਿਨ ਮਿਲੇ; ਓੜ ਕੇ ਮੁਖ ਤੇ ਸਵੇਰਾ, ਸੰਨਿਆ ਵਿਚ ਲੇ ਕੇ ਸ਼ਾਮ ਰਾਤ ਦੇ ਬਾਜ਼ਾਰ ਦੇ ਵਿਚ ਮੂਲ ਵਿਕਣ ਜਾਂਦੇ ਦਿਨ ਮਿਲੇ; ਸੁਭਾ ਵਰਗੀ ਰੂਹ ਉਸਦੀ ਰਾਤ ਵਰਗੀ ਹੋ ਗਈ, ਜ਼ਿੰਦਗੀ ਵਿਚ ਉਸ ਨੂ ਕੁਛ ਇਸ ਤਰਾਂ ਦੇ ਦਿਨ ਮਿਲੇ |
अपने मोहरे से मैं खुद को ही शिखस्त देता हूँ , मैं अपने अक्स को इस तराँ फ़ना करता हूँ, हाथ उठाता नहीं और नज़रों से गिरा देता हूँ , इस तराँ कुछ फिदायानो से भी लड़ा करता हूँ| आसमाँ कम है कुछ इतनी ऊँची उड़ान है मेरी, खुद में ही उड़ता हूँ और खुद में ही समा जाता हूँ| शाम हो जाए तो इक सल्फा जला लेता हूँ , अंधेरी शाम को इतनी सी शमा देता हूँ|
खुश होता हूँ तुझे रकीब के साथ इक तरफ़ा महोबत का मैं इस तरहा...