December 2011
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aazadi
मुश्किल सा होता जा रहा है खुद को खुद ही से बचना  तोडो इस साँस की ज़ंज़ीर को और रिहा करो मुझ को खुदी से क्यों जो कतरा कतरा बहता है तू मेरी रगों में किसी जानलेवा रोग की तरह और मेरी नसों को तोड़ता है तेरी होंद का दर्द  नीला करता है मेरे बदन को तेरी छूअन का सर्द  सज़ा दो मुझे आज़ादी की इस मुर्दा बदन से  झोंक दो इस ‘अमन’ को किसी के हुस्न की अगन में मौत दो ऐसी की महक जाए मेरी कब्र  ...
Dec 12th
July 2011
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no name
मेरे रंज़-ए-ग़म की शियही से इक नज़म आई है, भावनाओं के कोत्ूहल को भी कलम खींच लाई है कोशिश ये है बिन काग़ज़ जलाए अपने दिल की गर्मी उतरना, और मज़ा ये है इस गर्मी मैं जलता अपना घर देखना और दर्द है इस घरोंदे मैं मेरा रह-बसर दीवानगी है इस मंज़र-ए-खाक में मेरा तुझ को पुकारना और खुशी है मेरी मौत पे तेरा गैर के साथ आना
Jul 27th
hope!
अंदर तक जला के, और खुद को दफ़ना के;                            भी देख लिया मैने आरज़ू है के इक बार जली बुझती ही नही. बारिश की बूँदों से हाथ भीगे तो ज़रूर, पर इस तरह तो नीर से मुट्ठी भरती ही नही. और ख़यालों ने की कुछ इस तरह से बेवफ़ाई हम से, के अब तो तेरी याद भी आ कर तड़पाती  ही नही.
Jul 3rd
June 2011
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me again!
मेरे सब्र की इंतहाँ तो देखो, वो रोया मेरी बाहों में किसी और के लिए.
Jun 28th
Missing
वही संगमरमर सा तराशा जिस्म है पर वो महोबबत भरा दिल गुमशुदा है, कुछ काम ना करे टूटे शब्दों के तीर या खुदा ये क्या आपदा है ;   इक और रात तेरी सोच मैं कटी क्या ये तुझ को पता है सोचता हूँ तुझ से करूँ शिकायत, पर खामोशी तो महोब्बत का क़ायदा है छोड़ आओ घर मेरे लावारिस ज़जबातों को  अगर किसी को तेरा घर पता है; देखना मारे खुशी के मर ना जाए वो शख्स जो मेरा कफ़न नापता है ...
Jun 7th
October 2010
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ਤੇਰੀ ਯਾਦ
ਤੇਨੂੰ ਪਿਆਰ ਕਰਨਾ ਮੇਰੇ ਨਸੀਬਾਂ ਵਿੱਚ ਸੀ ਪਰ ਤੇਰਾ ਮਿਲਣਾ ਮੇਰੀ ਕਿਸਮਤ ਤੋਂ ਬਾਹਰ ਸੀ । ਮੈਂ ਚਾਨਣ ਤੋਂ ਵਿਛੜੀ ਹੋਈ ਦੀਵੇ ਦੀ ਲਾਟ ਹਾਂ । ਅੱਧਾ ਦਿਨ ਤੇਨੂੰ ਉਡੀਕਦਿਆਂ ਅਤੇ ਸਾਰੀ ਸ਼ਾਮ ਤੇਨੂੰ ਯਾਦ ਕਰਦਿਆਂ ਲੰਘਦੀ ਹੈ l  ਅਜੇ ਤੱਕ ਤੇਰੇ ਖ਼ਤਾਂ ਵਿੱਚੋਂ ਤੇਰੀ ਖ਼ੁਸ਼ਬੂ ਨਹੀ ਗਈ । ਜੇ ਤੇਰੀ ਯਾਦ ਨਾ ਆਵੇ ਤਾਂ ਰੰਗ ਵੀ, ਨੂਰ ਵੀ, ਹਵਾ ਵੀ, ਮੈਂ ਵੀ ਉਦਾਸ ਰਹਿੰਦੇ ਹਾਂ । ਮੇਰੀਆਂ ਸੋਚਾਂ ਅਤੇ ਮੇਰੇ ਅਮਲਾਂ ਉੱਪਰ, ਮੇਰੀ ਨੀਂਦ ਅਤੇ ਸੁਪਨਿਆਂ ਉੱਤੇ ਤੂੰ ਰਾਜ ਕੀਤੇ ਹੈ ।  ਮੈਂ ਤੇਨੂੰ...
Oct 10th
August 2010
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to my lost friend
“कई हसीन मंज़र आँखों से ख़फा हो गए आँख खोली जो मैने रोज़े सियाही में कई अज़ीज़ पास्वा थे जो जुदा हो गये ”
Aug 13th
भूल ना पाएँगे तुझे अक्सर ये गुमा होता था , आज इक रात कट गई तेरा नाम याद करने में; पाँव पडते तेरे, मेरा शहर महका करता था , तेरी मीठी सी खुश्बू अब भी मेरे घर से आती है; हवा के महलों पे तेरा अक्स पढ़ती मेरी नज़र और वो सर्द रातों में तेरी सासों की महक; ज़ंजीरें खोलती मेरे ख्यालों की, वो तेरी आमद तू कोई ख़याल है कोई रंज या कोई वहम मेरा , ये कशमकश में एक और सदी कटती है और वो चलते पानी पे तेरा ठहरा चेहरा...
Aug 29th
ਦਿਨ
ਕੁਝ ਤਿਲਮਿਲਾਓਂਦੇ ਦਿਨ ਮਿਲੇ ਕੁਝ ਮੁਸਕਰੌਂਦੇ ਦਿਨ ਮਿਲੇ ਤੇਰੇ ਸ਼ਹਿਰ ਵਿਚ  ਸਾਨੂ ਸਭ ਤਰਾਂ ਦੇ ਦਿਨ ਮਿਲੇ; ਓੜ ਕੇ ਮੁਖ ਤੇ ਸਵੇਰਾ, ਸੰਨਿਆ ਵਿਚ ਲੇ ਕੇ ਸ਼ਾਮ ਰਾਤ ਦੇ ਬਾਜ਼ਾਰ ਦੇ ਵਿਚ ਮੂਲ ਵਿਕਣ ਜਾਂਦੇ ਦਿਨ ਮਿਲੇ; ਸੁਭਾ ਵਰਗੀ ਰੂਹ ਉਸਦੀ ਰਾਤ ਵਰਗੀ ਹੋ ਗਈ, ਜ਼ਿੰਦਗੀ ਵਿਚ ਉਸ ਨੂ ਕੁਛ ਇਸ ਤਰਾਂ ਦੇ ਦਿਨ ਮਿਲੇ |
Aug 28th
अपने मोहरे से मैं खुद को ही शिखस्त देता हूँ , मैं अपने अक्स को इस तराँ फ़ना करता हूँ, हाथ उठाता नहीं और नज़रों से गिरा देता हूँ , इस तराँ कुछ फिदायानो से भी लड़ा करता हूँ| आसमाँ कम है कुछ इतनी ऊँची उड़ान है मेरी, खुद में ही उड़ता हूँ और खुद में ही समा जाता हूँ| शाम हो जाए तो इक सल्फा जला लेता हूँ , अंधेरी शाम को इतनी सी शमा देता हूँ| खुश होता हूँ तुझे रकीब के साथ इक तरफ़ा महोबत का मैं इस तरहा...
Aug 27th
July 2009
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इस बार तो हंस ही देंगे गम की जो आमद होगी गम भी खुश  होगा मेरी खुशामद देख कर अपने चेहरे पे हमने एक भी शीकन  पड़ने ना दी अशक सूखे हैं किसी को ना ये गुमा होगा चाक  गहरे हैं सीने  की हिमत्त ना रही बस इक गिनती है जो  उंगलियों पे किया करते हैं डरता है के बारिश हो ना जाए मेरे बंज़र पे कुछ इस कदर सहमा है  ‘रब खली’ मौत के डर से क ल म रोती रही क्ल रत कुछ काग़ज़ के पन्नो पे फलसफा लिखने...
Jul 7th
दिया ले के बैठे हैं खुद की ही कब्र पे या खुदा इंतज़ार किसी को इतना  भी लंबा ना  करा हर रात ओडता हूँ तेरे वादों  की चादर डर है चाँदनी मेरे ज़ख़्म ज़ाहिर   ना कर दे उसके आँखों की चमक देखने के लिए आग खुद के ही घर को लगा दिया करते थे उसके जिस्म की महक लेने के लिए कत्ल फूलों का भी किया करते थे अब ना वो दिन हैं  ना महोबबत के वो पल वो अंज़र किसी और शहर छोड़ आए थे खुशी अपनी ही मौत की इस से ज़यादा और...
Jul 7th
February 2009
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“I do not have ambitions nor desires, Being poet it is not my ambition, It is...”
Feb 23rd
January 2009
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तुम
अक्सर मैं ’तुम’ हो जाता हूँ, एक आईने में खो जाता हूँ;  चाँदनी से अंधेरे में, धुंद के वीराने में लफ़्ज़ों के फसाने में, सुर हैं कुछ झरनों के, रंग हैं कुछ झिलमिल से, और कहीं दूर एक जलतरंग है, मेरा साया ही मेरे संग है, इस लफ़्ज़ों के फसाने में मैं खो जाता हूँ, शायद मैं ’तुम’ हो जाता हूँ
Jan 27th
December 2008
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go green
दिल-ए-गुल्फाम से निकले तो वीराँ आया, वो तेरी झील से आँखों का इक सलाम आया, तेरे आगोश से निकलेंगे तो खबर होगी हमें, खुदा कहाँ से तेरी आँखों के हरे रंग लाया, उसके लब की एक धर्ध्राहट से, पत्थर के दिल मैं भी इक अरमां आया, यूं तो और भी तरीके थे कत्ल करने के, रब को जाने क्यों तेरा ही ख्याल आया !
Dec 12th
zinda hoon
जो जी न पाया जिन्दा हूँ उस पल क लिए वो पल जो जिंदगी मैं कभी आया ही नहीं, हकीक़त क्या सपने मैं भी उसे जी पाया नहीं, न सोचा आज क्या होगा न सोचा खभी कल क लिए जो जी न पाया जिन्दा हूँ उस पल क लिए. उस पल क लिए मैंने जिंदगी को फ़ना कर दिया, फिर मौत ने आगोश मैं लेने से मना कर दिया, उसके पास भी कब वक़त  था मुझ पागल क लिए  जो जी न पाया जिंदा हूँ उस पल क लिए मेरी जिंदगी को मकसद उसको  जिंदगी मैं लाना था,...
Dec 2nd
October 2008
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aman →
Oct 13th
तो है गैर के आगोश में और फ़िक्र मेरा है , यार तेरी वफादारी का शुकरिया !
Oct 13th
तस्वीर को छोड़ कर , कर ली तस्सवुर से दोस्ती ; सोचता हूँ महक तेरी सांसों की कैसी होगी, टूटा शाख का पत्ता हूँ यां इक शब्द अधूरा सा , सोचता हूँ भीड़ की तन्हाई कैसी होगी अभी तो शामिल था तेरी रूह में मेरा  नाम सोचता हूँ तेरे अक्स को तेरी रूह ने कहाँ को कहाँ खोया होगा , यूं लगता है पड़ी सदिया हैं सांझ ढलने को , अभी कहाँ यारों ने मेरा जिस्म जलाया होगा दिल मैं गर्मी है अभी तेरी मीठी...
Oct 13th
Oct 12th
“या खुदा रात को मेरी तू इतना लम्बा न कर डर है काफ़िर हो न जाऊं सुबह होने तक”
Oct 12th
हसीन मौत
आज झाँका तो देखा मेरी रूह में तेरे सिवा कुछ बचा ही नहीं बंद हो जाएँ गर ऑंखें तो तेरी चाहत के सिवा कुछ भी नहीं तू गर हंस दे - तो मेरे यार ईद होती है वरना इस दिल में अमावस के सिवा कुछ भी नहीं  तेरे दीदार को तरसी हैं सदियों से ये आँखें या खुदा दर में तेरे अंधेर इतना तो नहीं पास हो कर भी तू कभी पास न आया अभी पैमाना-ए-वफ़ा इक तरफ झुका तो नहीं तसव्वुर-ए-जुम्बुश-ए-लब फना कर देगा हमें एक हसीन मौत का मीठा...
Oct 12th
परदे के पीछे
कुछ दूर चला  तो पाया ‘फाकिर’ , के वो भी मनसूबा-ए-कातिल सा जिगर रखते हैं; तराशा जिस्म देख कर ये मान ही न लूं, की ये तो वो हैं जो कई इश्क-ए-गुनाह रखते हैं चल पड़े न सांसें हुस्न का वो पहलु देख कर , हम भी कुछ कातिल सा इमां रखते हैं; तुम करो इश्क रखो हुस्न से राबता हम तो वो हैं जो परदे के पीछे की खबर रखते हैं
Oct 11th
September 2008
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बारिश
आज बारिश ने हटा दी है मेरी कबर से मिट्टी, दबा किसी गैर का मकां नज़र आता है; लिपटी धुल की चादरों में थी खवाहिशें थी मेरी, आज इक ख्वाब मरा  सा नज़र आता है; तेरी हर याद से जुडा है इक पहलु मेरा , इस में खुद को ही ढूँढ पाना  मुश्किल सा नज़र आता है; कट गया  था  हर शय से तुझ से जुड़ने के बाद , अब तो हर शय में तेरा चेहरा नज़र आता है
Sep 5th