December 2011
1 post
aazadi
मुश्किल सा होता जा रहा है खुद को खुद ही से बचना
तोडो इस साँस की ज़ंज़ीर को और रिहा करो मुझ को खुदी से
क्यों जो कतरा कतरा बहता है तू मेरी रगों में किसी जानलेवा रोग की तरह
और मेरी नसों को तोड़ता है तेरी होंद का दर्द
नीला करता है मेरे बदन को तेरी छूअन का सर्द
सज़ा दो मुझे आज़ादी की इस मुर्दा बदन से
झोंक दो इस ‘अमन’ को किसी के हुस्न की अगन में
मौत दो ऐसी की महक जाए मेरी कब्र
...
July 2011
2 posts
no name
मेरे रंज़-ए-ग़म की शियही से इक नज़म आई है, भावनाओं के कोत्ूहल को भी कलम खींच लाई है कोशिश ये है बिन काग़ज़ जलाए अपने दिल की गर्मी उतरना, और मज़ा ये है इस गर्मी मैं जलता अपना घर देखना और दर्द है इस घरोंदे मैं मेरा रह-बसर दीवानगी है इस मंज़र-ए-खाक में मेरा तुझ को पुकारना और खुशी है मेरी मौत पे तेरा गैर के साथ आना
hope!
अंदर तक जला के, और खुद को दफ़ना के;
भी देख लिया मैने
आरज़ू है के इक बार जली बुझती ही नही.
बारिश की बूँदों से हाथ भीगे तो ज़रूर,
पर इस तरह तो नीर से मुट्ठी भरती ही नही.
और ख़यालों ने की कुछ इस तरह से बेवफ़ाई हम से,
के अब तो तेरी याद भी आ कर तड़पाती ही नही.
June 2011
2 posts
me again!
मेरे सब्र की इंतहाँ तो देखो,
वो रोया मेरी बाहों में किसी और के लिए.
Missing
वही संगमरमर सा तराशा जिस्म है पर वो महोबबत भरा दिल गुमशुदा है,
कुछ काम ना करे टूटे शब्दों के तीर या खुदा ये क्या आपदा है ;
इक और रात तेरी सोच मैं कटी क्या ये तुझ को पता है
सोचता हूँ तुझ से करूँ शिकायत,
पर खामोशी तो महोब्बत का क़ायदा है
छोड़ आओ घर मेरे लावारिस ज़जबातों को
अगर किसी को तेरा घर पता है;
देखना मारे खुशी के मर ना जाए
वो शख्स जो मेरा कफ़न नापता है
...
October 2010
1 post
ਤੇਰੀ ਯਾਦ
ਤੇਨੂੰ ਪਿਆਰ ਕਰਨਾ ਮੇਰੇ ਨਸੀਬਾਂ ਵਿੱਚ ਸੀ ਪਰ ਤੇਰਾ ਮਿਲਣਾ ਮੇਰੀ ਕਿਸਮਤ ਤੋਂ ਬਾਹਰ ਸੀ । ਮੈਂ ਚਾਨਣ ਤੋਂ ਵਿਛੜੀ ਹੋਈ ਦੀਵੇ ਦੀ ਲਾਟ ਹਾਂ । ਅੱਧਾ ਦਿਨ ਤੇਨੂੰ ਉਡੀਕਦਿਆਂ ਅਤੇ ਸਾਰੀ ਸ਼ਾਮ ਤੇਨੂੰ ਯਾਦ ਕਰਦਿਆਂ ਲੰਘਦੀ ਹੈ l ਅਜੇ ਤੱਕ ਤੇਰੇ ਖ਼ਤਾਂ ਵਿੱਚੋਂ ਤੇਰੀ ਖ਼ੁਸ਼ਬੂ ਨਹੀ ਗਈ । ਜੇ ਤੇਰੀ ਯਾਦ ਨਾ ਆਵੇ ਤਾਂ ਰੰਗ ਵੀ, ਨੂਰ ਵੀ, ਹਵਾ ਵੀ, ਮੈਂ ਵੀ ਉਦਾਸ ਰਹਿੰਦੇ ਹਾਂ । ਮੇਰੀਆਂ ਸੋਚਾਂ ਅਤੇ ਮੇਰੇ ਅਮਲਾਂ ਉੱਪਰ, ਮੇਰੀ ਨੀਂਦ ਅਤੇ ਸੁਪਨਿਆਂ ਉੱਤੇ ਤੂੰ ਰਾਜ ਕੀਤੇ ਹੈ । ਮੈਂ ਤੇਨੂੰ...
August 2010
1 post
to my lost friend
“कई हसीन मंज़र आँखों से ख़फा हो गए आँख खोली जो मैने रोज़े सियाही में कई अज़ीज़ पास्वा थे जो जुदा हो गये ”
भूल ना पाएँगे तुझे अक्सर ये गुमा होता था , आज इक रात कट गई तेरा नाम याद करने में; पाँव पडते तेरे, मेरा शहर महका करता था , तेरी मीठी सी खुश्बू अब भी मेरे घर से आती है; हवा के महलों पे तेरा अक्स पढ़ती मेरी नज़र और वो सर्द रातों में तेरी सासों की महक; ज़ंजीरें खोलती मेरे ख्यालों की, वो तेरी आमद तू कोई ख़याल है कोई रंज या कोई वहम मेरा , ये कशमकश में एक और सदी कटती है और वो चलते पानी पे तेरा ठहरा चेहरा...
ਦਿਨ
ਕੁਝ ਤਿਲਮਿਲਾਓਂਦੇ ਦਿਨ ਮਿਲੇ ਕੁਝ ਮੁਸਕਰੌਂਦੇ ਦਿਨ ਮਿਲੇ ਤੇਰੇ ਸ਼ਹਿਰ ਵਿਚ ਸਾਨੂ ਸਭ ਤਰਾਂ ਦੇ ਦਿਨ ਮਿਲੇ; ਓੜ ਕੇ ਮੁਖ ਤੇ ਸਵੇਰਾ, ਸੰਨਿਆ ਵਿਚ ਲੇ ਕੇ ਸ਼ਾਮ ਰਾਤ ਦੇ ਬਾਜ਼ਾਰ ਦੇ ਵਿਚ ਮੂਲ ਵਿਕਣ ਜਾਂਦੇ ਦਿਨ ਮਿਲੇ; ਸੁਭਾ ਵਰਗੀ ਰੂਹ ਉਸਦੀ ਰਾਤ ਵਰਗੀ ਹੋ ਗਈ, ਜ਼ਿੰਦਗੀ ਵਿਚ ਉਸ ਨੂ ਕੁਛ ਇਸ ਤਰਾਂ ਦੇ ਦਿਨ ਮਿਲੇ |
अपने मोहरे से मैं खुद को ही शिखस्त देता हूँ , मैं अपने अक्स को इस तराँ फ़ना करता हूँ, हाथ उठाता नहीं और नज़रों से गिरा देता हूँ , इस तराँ कुछ फिदायानो से भी लड़ा करता हूँ| आसमाँ कम है कुछ इतनी ऊँची उड़ान है मेरी, खुद में ही उड़ता हूँ और खुद में ही समा जाता हूँ| शाम हो जाए तो इक सल्फा जला लेता हूँ , अंधेरी शाम को इतनी सी शमा देता हूँ|
खुश होता हूँ तुझे रकीब के साथ इक तरफ़ा महोबत का मैं इस तरहा...
July 2009
2 posts
इस बार तो हंस ही देंगे गम की जो आमद होगी गम भी खुश होगा मेरी खुशामद देख कर
अपने चेहरे पे हमने एक भी शीकन पड़ने ना दी अशक सूखे हैं किसी को ना ये गुमा होगा
चाक गहरे हैं सीने की हिमत्त ना रही बस इक गिनती है जो उंगलियों पे किया करते हैं
डरता है के बारिश हो ना जाए मेरे बंज़र पे कुछ इस कदर सहमा है ‘रब खली’ मौत के डर से
क ल म रोती रही क्ल रत कुछ काग़ज़ के पन्नो पे फलसफा लिखने...
दिया ले के बैठे हैं खुद की ही कब्र पे या खुदा इंतज़ार किसी को इतना भी लंबा ना करा हर रात ओडता हूँ तेरे वादों की चादर डर है चाँदनी मेरे ज़ख़्म ज़ाहिर ना कर दे उसके आँखों की चमक देखने के लिए आग खुद के ही घर को लगा दिया करते थे उसके जिस्म की महक लेने के लिए कत्ल फूलों का भी किया करते थे अब ना वो दिन हैं ना महोबबत के वो पल वो अंज़र किसी और शहर छोड़ आए थे खुशी अपनी ही मौत की इस से ज़यादा और...
February 2009
1 post
I do not have ambitions nor desires, Being poet it is not my ambition, It is...
January 2009
1 post
तुम
अक्सर मैं ’तुम’ हो जाता हूँ, एक आईने में खो जाता हूँ; चाँदनी से अंधेरे में, धुंद के वीराने में लफ़्ज़ों के फसाने में, सुर हैं कुछ झरनों के, रंग हैं कुछ झिलमिल से, और कहीं दूर एक जलतरंग है, मेरा साया ही मेरे संग है, इस लफ़्ज़ों के फसाने में मैं खो जाता हूँ, शायद मैं ’तुम’ हो जाता हूँ
December 2008
2 posts
go green
दिल-ए-गुल्फाम से निकले तो वीराँ आया,
वो तेरी झील से आँखों का इक सलाम आया,
तेरे आगोश से निकलेंगे तो खबर होगी हमें,
खुदा कहाँ से तेरी आँखों के हरे रंग लाया,
उसके लब की एक धर्ध्राहट से,
पत्थर के दिल मैं भी इक अरमां आया,
यूं तो और भी तरीके थे कत्ल करने के,
रब को जाने क्यों तेरा ही ख्याल आया !
zinda hoon
जो जी न पाया जिन्दा हूँ उस पल क लिए वो पल जो जिंदगी मैं कभी आया ही नहीं, हकीक़त क्या सपने मैं भी उसे जी पाया नहीं, न सोचा आज क्या होगा न सोचा खभी कल क लिए जो जी न पाया जिन्दा हूँ उस पल क लिए. उस पल क लिए मैंने जिंदगी को फ़ना कर दिया, फिर मौत ने आगोश मैं लेने से मना कर दिया, उसके पास भी कब वक़त था मुझ पागल क लिए जो जी न पाया जिंदा हूँ उस पल क लिए मेरी जिंदगी को मकसद उसको जिंदगी मैं लाना था,...
October 2008
7 posts
aman →
तो है गैर के आगोश में और फ़िक्र मेरा है ,
यार तेरी वफादारी का शुकरिया !
तस्वीर को छोड़ कर , कर ली तस्सवुर से दोस्ती ;
सोचता हूँ महक तेरी सांसों की कैसी होगी,
टूटा शाख का पत्ता हूँ यां इक शब्द अधूरा सा ,
सोचता हूँ भीड़ की तन्हाई कैसी होगी
अभी तो शामिल था तेरी रूह में मेरा नाम
सोचता हूँ तेरे अक्स को तेरी रूह ने कहाँ को कहाँ खोया होगा ,
यूं लगता है पड़ी सदिया हैं सांझ ढलने को ,
अभी कहाँ यारों ने मेरा जिस्म जलाया होगा
दिल मैं गर्मी है अभी तेरी मीठी...
या खुदा रात को मेरी तू इतना लम्बा न कर
डर है काफ़िर हो न जाऊं सुबह होने तक
हसीन मौत
आज झाँका तो देखा मेरी रूह में तेरे सिवा कुछ बचा ही नहीं बंद हो जाएँ गर ऑंखें तो तेरी चाहत के सिवा कुछ भी नहीं तू गर हंस दे - तो मेरे यार ईद होती है वरना इस दिल में अमावस के सिवा कुछ भी नहीं तेरे दीदार को तरसी हैं सदियों से ये आँखें या खुदा दर में तेरे अंधेर इतना तो नहीं पास हो कर भी तू कभी पास न आया अभी पैमाना-ए-वफ़ा इक तरफ झुका तो नहीं तसव्वुर-ए-जुम्बुश-ए-लब फना कर देगा हमें एक हसीन मौत का मीठा...
परदे के पीछे
कुछ दूर चला तो पाया ‘फाकिर’ ,
के वो भी मनसूबा-ए-कातिल सा जिगर रखते हैं;
तराशा जिस्म देख कर ये मान ही न लूं,
की ये तो वो हैं जो कई इश्क-ए-गुनाह रखते हैं
चल पड़े न सांसें हुस्न का वो पहलु देख कर ,
हम भी कुछ कातिल सा इमां रखते हैं;
तुम करो इश्क रखो हुस्न से राबता
हम तो वो हैं जो परदे के पीछे की खबर रखते हैं
September 2008
1 post
बारिश
आज बारिश ने हटा दी है मेरी कबर से मिट्टी, दबा किसी गैर का मकां नज़र आता है; लिपटी धुल की चादरों में थी खवाहिशें थी मेरी, आज इक ख्वाब मरा सा नज़र आता है; तेरी हर याद से जुडा है इक पहलु मेरा , इस में खुद को ही ढूँढ पाना मुश्किल सा नज़र आता है; कट गया था हर शय से तुझ से जुड़ने के बाद , अब तो हर शय में तेरा चेहरा नज़र आता है